गौरव कुमार AV भारत न्युज संवाददाता बखरी/ बेगूसराय
बखरी विधानसभा में सियासी घमासान
बखरी विधानसभा सीट पर इस बार का मुकाबला न सिर्फ राजनीतिक दलों के बीच शक्ति प्रदर्शन का गवाह बनेगा, बल्कि सामाजिक समीकरणों और रणनीतिक चालों का भी बड़ा अखाड़ा बन चुका है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित यह सीट एक बार फिर से बेहद रोमांचक मोड़ पर है, जहां हर उम्मीदवार अपना दांव-पेंच आजमा रहा है।
2020 का चुनाव परिणाम और बखरी का रुझान
2020 के विधानसभा चुनाव में सीपीआई के सूर्यकांत पासवान ने सिर्फ 777 वोटों के बेहद कम अंतर से जीत दर्ज की थी, जिससे यह साफ हो गया था कि बखरी की जनता किस हद तक बंट चुकी है और मुकाबला कितना करीबी होता जा रहा है।
पिछले तीन चुनाव के इन आंकड़ों से साफ है कि बखरी सीट पर कोई भी पार्टी लगातार पकड़ नहीं बना सकी है। हर चुनाव में जनता ने अलग फैसला दिया है।
जातीय समीकरण और चुनावी रणनीति
इस बार चुनावी मैदान में उतरने वाले उम्मीदवारों की सूची लंबी है, और प्रतीकों की लड़ाई भी उतनी ही दिलचस्प हो चली है। बखरी में पिछड़ों, महादलितों और मुस्लिम वोटों की हिस्सेदारी भी अहम है।
इस बार सीपीआई उम्मीदवार सूर्यकांत पासवान को जहां वामपंथी विचारधारा का मजबूत समर्थन मिल रहा है, वहीं एनडीए के तहत लोजपा (रामविलास) के संजय पासवान को मोदी, नीतीश और रामविलास पासवान के नाम पर सहानुभूति लहर का फायदा मिलने की उम्मीद है।
वहीं जन सुराज से मैदान में उतरे डॉ. संजय पासवान भी पढ़े-लिखे युवा मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं।
निर्दलीय उम्मीदवार और वोटकटवा फैक्टर
निर्दलीय उम्मीदवारों की मौजूदगी वोटकटवा की भूमिका निभा सकती है, जिससे मुख्य दलों की रणनीति पर असर पड़ना तय है।
बखरी विधानसभा सीट पर 2025 का चुनाव पूरी तरह त्रिकोणीय से बहुकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ चुका है।
रणनीति, जातीय संतुलन, गठबंधन और चेहरे — हर पहलू इस बार निर्णायक साबित हो सकता है।
777 वोटों के बाद अब हर वोट की कीमत बढ़ी
777 वोटों की पिछली जीत के बाद हर वोट की कीमत बढ़ गई है।
अब देखना यह है कि जनता इस बार किसके सिर पर जीत का सेहरा बांधती है और कौन बनेगा बखरी का अगला विधायक बनते है।
