नवीन कुमार मिश्रा AV भारत न्युज संवाददाता
हिन्दू धर्मावलंबियों ने कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि शनिवार को देवउठनी एकादशी मनाया।संसार के पालनकर्ता भगवान श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा- उपासना की।कहते है कि इस एकादशी का व्रत रखने से सभी पापों से छुटकारा मिलता है।पंडित दानेश कुमार दीपक ने बताया कि देवोत्थान एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं और सृष्टि का संचालन फिर से संभाल लेते हैं।इसी के साथ चातुर्मास समाप्त होता है और विवाह,गृह प्रवेश जैसे सभी शुभ एवं मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं।
यह एकादशी साल भर की एकादशियों में सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है और व्रत व पूजा-पाठ से सभी पापों से मुक्ति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है जैसा कि पद्मपुराण में भी बताया गया है।कथा के अनुसार एक राजा था,उसके राज्य में प्रजा सुखी थी।एकादशी को कोई भी अन्न नहीं बेचता था।सभी फलाहार करते थे।एक बार भगवान ने राजा की परीक्षा लेनी चाही।भगवान ने एक सुंदरी का रूप धारण कर सड़क पर बैठ गए। तभी राजा उधर से निकला और सुंदरी को देख चकित रह गया।उसने पूछा: “हे सुंदरी!तुम कौन हो और इस तरह यहाँ क्यों बैठी हो?” तब सुंदर स्त्री बने भगवान बोले,“मैं निराश्रिता हूँ।राजा उसके रूप पर मोहित होकर बोला, “तुम मेरे महल में चलकर मेरी रानी बनकर रहो।” सुंदरी बोली, मैं आपकी बात मानूंगी,पर आपको राज्य का अधिकार मुझे सौंपना होगा।मैं जो भी बनाऊंगी,आपको खाना होगा।”राजा उसकी सभी शर्तें स्वीकार कर लीं।अगले दिन एकादशी थी। रानी ने हुक्म दिया कि बाजारों में अन्य दिनों की तरह अन्न बेचा जाए।उसने घर में मांस- मछली आदि पकवाए तथा परोस कर राजा से खाने के लिए कहा।यह देखकर राजा बोला एकादशी के दिन मैं केवल फलाहार करता हूँ।रानी ने शर्त याद दिलाई और कहा नहीं खाओगे तो मैं बड़े राजकुमार का सिर काट दूंगी।”राजा ने अपनी स्थिति बड़ी रानी से कही तो बड़ी रानी बोली,“महाराज! धर्म न छोड़ें,बड़े राजकुमार का सिर दे दें।पुत्र तो फिर मिल जाएगा,पर धर्म नहीं मिलेगा।”इसी दौरान बड़ा राजकुमार खेलकर आ गया। माँ की आंखों में आंसू देखकर वह रोने का कारण पूछने लगा तो माँ ने उसे सारी वस्तुस्थिति बता दी। तब वह बोला,“मैं सिर देने के लिए तैयार हूँ। पिताजी के धर्म की रक्षा होगी।”राजा दुःखी मन से राजकुमार का सिर देने को तैयार हुआ तो रानी के रूप से भगवान विष्णु प्रकट होकर असली बात बताई, “राजन! तुम इस कठिन परीक्षा में पास हुए।” भगवान ने प्रसन्न मन से राजा से वर मांगने को कहा तो राजा बोला, “आपका दिया सब कुछ है।हमारा उद्धार करें और तभी से देवोत्थान एकादशी मनाया जाने लगा।
