मिन्टू कुमार झा AV भारत न्युज संवाददाता मंसूरचक / बेगूसराय
मंसूरचक प्रखंड के गणपतौल में स्थित है। शक्तिपीठों में से एक मां रक्तदंतिका मंदिर है। यहां पर शारदीय नवरात्र के अवसर पर रक्तदंतिका की पूजा का विशेष महत्व है। यहां दूर दूर से श्रद्धालु पूजा करने पहुंचते हैं। रक्तदंतिका मंदिर को लोग बड़ी दुर्गा स्थान के नाम से भी जानते हैं। पूजा समिति के अधिकारी बताते हैं कि हिन्दू व मुस्लिम पूजा को लेकर शारीरिक श्रम करते थे। इसमें मुस्लिम बुजुर्गों का आर्थिक सहयोग भी होता था। हिन्दू औरतों की तरह मुस्लिम महिलाएं भी मां के दरबार में आकर मन्नतें मांगती थी। इसी का नतीजा था कि मां रक्तदंतिका की पूजा सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल हुआ करती है। आज भी वह परंपरा चल रहा है।

मां रक्तदंतिका की पूजा सैकड़ों वर्षो से होती आ रही है। जिले के प्राचीनतम दुर्गा मंदिरों में से एक बड़ी दुर्गा माता के नाम से चर्चित रक्तदंतिका की पूजा का इतिहास काफी पुराना है। यहां लाल रंग की मूर्ति की पूजा का प्रचलन है। बताया जाता है कि तत्कालीन जमींदार गुरु प्रसाद लाल ने यह मंदिर बनवाया था.1902 के सर्वे में दुर्गा महारानी के नाम से मंदिर के लिए जमीन बंदोबस्ती का प्रमाण मिला। लेकिन मंदिर उससे भी कहीं पुराना है। बताया जाता है कि वर्ष 1880 में मंदिर के पुनर्निर्माण के क्रम में एक भक्त को को सैकड़ों वर्ष पुराना काले पत्थर की नारी आकृति का सिर और पीतल का बड़ा दीप मिला था। काले पत्थर की मूर्ति आज भी दर्शन के लिए उपलब्ध है।

इसकी प्रतिदिन पूजा और आरती होती है। वर्ष 1948 में तत्कालीन जमींदार अंबा प्रसाद ने मंदिर को स्थानांतरित कर सड़क के किनारे मूर्ति बनवाई थी। जो सप्तमी तिथि को स्वयं खंडित हो गई उस वर्ष इलाके में महामारी के रूप में प्लेग फैला था। जिसमें सैकड़ों मवेशियों और लोगों की जान चली गई। 70 के दशक से पूर्व इस मंदिर में बलि प्रदान किया जाता था। जो बाद में बंद हो गया।
कहते है पुजारी नित्यानंद झा
रक्तदंतिका की पूजा शारदीय नवरात्र में होती है। पूजा पाठ से मनोकामना पूरी होती है। नौवीं एवं दशमी को यहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है। मां की महिमा अपरंपार है।
