नवीन कुमार मिश्रा AV भारत न्युज संवाददाता नावकोठी/बेगूसराय
शारदीय नवरात्र के आठवें दिन महासप्तमी पर की गई मां कालरात्रि की पूजा – अर्चना।मां कालरात्रि की पूजा करने से भक्त को भयमुक्ति,साहस, शनि-राहु-केतु दोष शांति और दिव्य ज्ञान प्राप्त होता है।मां कालरात्रि का उग्र रूप हमें यह सिखाता है कि अज्ञान,भय और पाप के अंधकार को केवल देवी की कृपा और ज्ञान के प्रकाश से ही नष्ट किया जा सकता है। माता कालरात्रि को ही काली,महायोगिनी, शुभंकरी और महायोगीश्वरी कहा जाता है। नवरात्रि की इस तिथि को निशा की रात भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन रात के समय मां की पूजा की जाती है।तंत्रमंत्र साधना करने वाले माता कालरात्रि की विशेष पूजा अर्चना करते हैं।काली मां इस कलियुग में प्रत्यक्ष फल देने वाली माता हैं।मां कालरात्रि का शरीर घने अंधकार के समान काला है।उनके बाल बिखरे हुए हैं और गले में बिजली की तरह चमकती माला है। उनके तीन गोल नेत्र हैं, जिससे अग्नि की ज्वालाएं निकलती रहती हैं, और उनका वाहन गधा है। उनके हाथों में खड्ग (कटार) और लोहे का कांटा रहता है तथा एक हाथ अभय और दूसरा वर मुद्रा में होता है।पंडित उमेश मिश्रा व सुरेश मिश्रा ने बताया कि महाकाली की कथा मुख्य रूप से राक्षस रक्तबीज के वध से संबंधित है।जब रक्तबीज के शरीर से गिरने वाली रक्त की हर बूँद से नए रक्तबीज उत्पन्न हो जाते थे, तब देवताओं ने देवी पार्वती से प्रार्थना की।क्रोध से देवी का विकराल रूप महाकाली में बदल गया,जिन्होंने रक्तबीज का वध किया। उनके क्रोध को रोकने के लिए भगवान शिव उनके मार्ग में लेट गए और उनके चरण शिव के शरीर पर पड़ने से उनका क्रोध शांत हुआ।मां के भक्तों ने मां के इस मंत्रः- दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे। चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते।।या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। का जप किया।
