नवीन कुमार मिश्रा | AV भारत न्युज संवाददाता | नावकोठी/बेगूसराय
नावकोठी प्रखण्ड क्षेत्र में शुक्रवार को गोपाष्टमी पर्व बड़ी आस्था व हर्षोल्लास पूर्वक मनाया गया। गोपाष्टमी का पर्व भगवान श्रीकृष्ण और गौ माता के प्रति हमारी श्रद्धा, प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। यह पर्व हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।
महिलाओं ने की गौमाता की पूजा
गोपाष्टमी पर्व को लेकर महिलाओं ने अहले-सुबह स्नान करके गौमाता की पूजा-अर्चना की व वस्त्र आदि ओढ़ाकर गाय माता को भोजन करवाया। महिलाएं पूजा की थाल सजाकर गौमाता को तिलक लगाया, सींग पर मोली बांध कर और फूलमालाएं चढ़ाकर बड़ी श्रद्धा-भावना के साथ गौ पूजन किया।
पंडित माधव पाठक ने बताया पर्व का महत्व

पंडित माधव पाठक ने बताया कि इस दिन जगत के पालनहार भगवान श्रीकृष्ण ने गौचारण शुरू किया था। इसलिए इसी तिथि पर गोपाष्टमी का पर्व मनाया जाता है। श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णन है कि भगवान श्रीकृष्ण गायों के संग खेला करते थे और उन्हें गायों से बेहद प्रेम था। शास्त्रों में भी गायों को देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है जो सुख और समृद्धि प्रदान करती हैं।
गोवर्धन पूजा का पौराणिक प्रसंग
इस दिन गोवर्धन पूजा प्राकृतिक विपत्तियों से बचाव के लिए की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने देखा कि सभी बृजवासी इंद्र देव की पूजा कर रहे थे। जब उन्होंने अपने नंदबाबा को भी इंद्र की पूजा करते हुए देखा तो उन्हें बड़ा अचरज हुआ। उन्होंने इसका कारण पूछा कि लोग इन्द्र देव की पूजा क्यों करते हैं?
तब नंदबाबा ने बताया कि वह वर्षा करते हैं जिससे अन्न की पैदावार होती और हमारी गायों को चारा मिलता है। उन्होंने उनकी पूजा रोक दी और उनसे गोवर्धन पर्वत की पूजा करने को कहा। श्री कृष्ण ने कहा — “ऐसा है तो सबको गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गायें तो वहीं चरती हैं।”

उनकी बात मानकर सभी ब्रजवासी इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे।
इन्द्र देव का क्रोध और कृष्ण का चमत्कार
देवराज इन्द्र ने भगवान कृष्ण की इस बात को अपना अपमान समझा। बदला लेने के लिए प्रलय के समान मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। तब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा कर ब्रजवासियों की भारी बारिश से रक्षा की थी।
इसके बाद इंद्र को पता लगा कि श्री कृष्ण वास्तव में विष्णु के अवतार हैं और अपनी भूल का एहसास हुआ। बाद में इंद्र देवता को भगवान कृष्ण से क्षमा याचना करनी पड़ी। उन्होंने भगवान कृष्ण का दुग्धाभिषेक किया। वह दूध जहां एकत्र हुआ उसे सुरभि कुंड कहा जाता है।
गोवर्धन पूजा की परंपरा की शुरुआत
इन्द्रदेव की याचना पर भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा और सभी ब्रजवासियों से कहा कि अब वे हर साल गोवर्धन की पूजा कर अन्नकूट पर्व मनाएं। तब से ही यह पर्व गोवर्धन पूजा के रूप में मनाया जाता है।
