अशोक पासवान AV भारत न्युज संवाददाता बीहट/बेगुसराय
संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से आहुति नाट्य अकादमी के द्वारा आयोजित राष्ट्रीय लोकनाट्य महोत्सव के दूसरे दिन मैथली नाटक “टूटल तागा के एक टा ओर “लेखक-महेन्द्र मलंगिया,परिकल्पना व निर्देशन-अभिषेक देवनारायण,प्रस्तुति-रंग अभ्युदय, के मंचन के पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित मैथिली साहित्यकार श्री प्रदीप बिहारी ,साहित्य अकादमी पुरस्कार से ही सम्मानित मैथिली साहित्यकार मेनका मल्लिक वरिष्ठ रंग निर्देशक व अभिनेता परवेज़ यूसुफ,अभिनेता उद्घोषक व कवि दीपक कुमार ने सम्मिलत रूप से दीप प्रज्वलित कर किया, सभी अतिथियों का स्वागत संस्था के सचिव रामानुज प्रसाद सिंह के द्वारा अंगवस्त्र व पुष्प गुच्छ देकर किया गया

प्रदीप बिहारी ने कहा हमारे देश की कला और संस्कृति की असली खुशबू हमारी लोक कलाओं व आंचलिक भाषा में ही निहित है,हमें अपने भाषा और संस्कृति पे गर्व करना और उसे आगे बढ़ाने के लिए सजग रहना होगा, आहुति नाट्य अकादमी ने कला को गाँव की मिट्टी से जोड़ने का जो कार्य कर रही है उसके लिए हम संस्था को बधाई देते हैं, मेनका मल्लिक ने सोसल मीडिया के बढ़ते प्रचलन के वजह से अपनी लोक कला,संस्कृति और साहित्य के प्रति घटते रूझान को खतरनाक बताया, उन्होंने गाँव में होने वाले त्योहार और घरेलू संस्कार पे गाये जाने वाले गीत,नृत्य,और नाट्य को ही कला और संस्कृति की जननी कहा,परवेज यूसुफ ने कला और कलाकार को हमेशा से चुनौती के साथ कार्य करने वाला समाजी कहा,वही मंच संचालन कर रहे कुमार अभिजीत ने आहुति नाट्य अकादमी के द्वारा किये जाने वाले इस कार्यक्रम को ग्रामीण क्षेत्र में कला और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का नवीन कदम बताते हुए कहा कला हमारे घर में जन्म से शुरू होते हुए चूल्हा,चौका, मुंडन,जनेऊ,विवाह,पर्व से गुजरते हुए पूरे जीवन ही नहीं मृत्यु के बाद तक हमारे साथ रहती है

वही दीपक कुमार ने कला को जीवन का अलग-अलग रंगों का प्रतिबिंब करार दिया, प्रस्तुत नाटक में भी जीवन के इसी रंग को बड़े ही रोचक और सरस अंदाज़ में दिखाया गया हमारा जीवन किसी टूटे हुए धागे के दोनों सिरों के समान है, क्या यह प्रश्न उठेगा कि टूटा हुआ सिरा वह खुद है.या उस धागे का दूसरा सिरा है, जीवन के पोले से टूटे हुए धागे के दोनों सिरों की कथा-व्यथा को दर्शाता नाटक पगडंडी के किनारे बरगद के पेड़ के नीचे गिरा हुआ एक घोंसला और चारो तरफ उड़ते हुए प्रेमी चिड़ा-चिड़ी के टूटे पंख की तरह जीवन के उहापोह में क्या घोंसला फिर से बसेगा या कि बवंडर में सबकुछ उजड़ जाएगा जैसे सवाल खड़ी करती रही, निर्देशक ने जीवन के अच्छे-बुरे, श्वेत-स्याह राग-रंग, अन्हरिया-इजोरिया में रचा-बसा प्रेम और घृणा, व्यक्ति की अस्मिता, निर्णय लेने का सामर्थ्य और अवसर, किसी एक क्षण की पीड़ा को जीवनपर्यंत भोगने के लिए अभिशप्त मनुष्य के अनेकों द्वंद और उससे जूझते दो व्यक्तियों के आर्तनाद को सफलता पूर्वक मंच पे उतारने में सफल रहे, टूटे हुए धागे के दोनों सिरों के बीच उचित-अनुचित, होश और आवेश के बीच की खींचतान को साकार रूप देने में समर्थ रहे

नाटक बड़े जन-मानस से जुड़े द्वंद और पीड़ा को बताने की कोशिश में सफल रही ।नाटक में काश्यप कमल “पवन झा” ने अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर गए, वही सुनीता झा ने मानवीय संवेदना को इस तरीके से जिया की दर्शकों की आँख भींगे बिना नहीं रह सकी नाटक में संगीत- प्रशांत मंडल,पेंटिंग-सर्व प्रिया झा,लाइट-मोहित मोहन, साउंड-सनोज शर्मा का था, प्रस्तुति के उपरांत संस्था के सचिव ने सभी कलाकारों एवं कार्यक्रम में सहयोग कर रहे बिट्टू कुमार,सचिन कुमार, सचिन कुमार-2,मोहित मोहन,सनोज शर्मा, मन्टुन कुमार,ऋषभ कुमार,रोशन कुमार,अंकित कुमार को अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया।
