विजय भारती ब्यूरो AV भारत न्युज बेगुसराय
लगता है चार दिवसीय भव्य मेला
भगवानपुर प्रखंड के ह्रदय स्थल से गुजरने वाली बलान नदी के उत्तरी कछार पर अवस्थित बनखंडी स्थान प्राचीन काल से ही अन्य जिलों के आस्थावानों में प्रसिद्ध रहा है। इस प्राचीन स्थल के संबंध में क्षेत्र में कई किंवदंतियां प्रचलित है जिसका प्राचीन काल से धार्मिक इतिहास रहा है।जिसका उल्लेख इस क्षेत्र के प्रसिद्ध साहित्यकार सह कवि द्वय ‘विन्दू जी ‘एवं ‘कुमुद जी ‘ ताउम्र आंशिक रूप से अपनी अपनी लेखनी के माध्यम से करते रहे हैं, जिसकी पुष्टि आज भी इस क्षेत्र के प्रसिद्ध ज्योतिष वयोवृद्ध आनंदी जी अपने मुखारविंद से करते हैं।
उपरोक्त विद्वानों की खोजी नजर तथा इस क्षेत्र में प्रचलित दंतकथा के अनुसार आज़ जहां बलान नदी अवस्थित है, प्राचीनकाल में पावन गंगा का पवित्र जलधारा प्रवाहित हुआ करता था।तब मिथिला के लोग अंतिम संस्कार, गंगा स्नान, गंगा सेवन तथा कल्पवास हेतु गंगा के उत्तरी तट पर अवस्थित वन क्षेत्र जो आज बनवारीपुर के नाम से जाना जाता है पर आया करते थे। कालांतर में गंगा उत्तर से दक्षिण दिशा की तरफ बढ़ी है। आज़ भी गेहुंनी तथा लखनपुर गाछी में गंगा सोती प्रमाण स्वरूप अवस्थित है। बनवारीपुर में आज़ भी गहराई तक खुदाई करने पर गंगोट मिट्टी तथा ढकनी कौड़ी मिलते हैं।

त्रेतायुग की बात है। गुरु विश्वामित्र के नेतृत्व में प्रभु श्रीराम अपने अनुज श्रीलखन जी के साथ मिथिला गमन के क्रम में जिस स्थान पर पवित्र गंगा पार उतरे थे आज वह स्थान अतरुआ घाट के नाम से प्रसिद्ध है।इस संदर्भ में स्थानीय बुद्धिजीवियों की जुबान पर निम्न दोहा आज भी मुखरित है _
उतरुआ उतरुआ सब कोई कहे,
उतरुआ जंगल से सपाट।
जब से प्रभु श्रीराम पार उतरे तब से अतरुआ घाट।।
अर्थात अतरुआ उतरुआ शब्द का अपभ्रंश है। स्थानीय बुद्धिजीवियों का मानना है कि इस घाट से प्रभु श्रीराम मिथिला गमन के क्रम में तीन बार पार उतरे थे।पार उतरने के बाद गंगा तट पर अवस्थित वन जो वर्तमान में बनवारीपुर के नाम से प्रसिद्ध है में कुछ दिनों का पड़ाव डाले थे।

कहा जाता है कि अयोध्या से मिथिला जाने के क्रम में प्रभु श्रीराम ग्यारह स्थानों पर ठहरे तथा जहां जहां वे ठहरे वहां वहां वे अपने इष्ट भगवान शिव को स्थापित कर पुजा अर्चना की।इस प्रकार उन्होंने इस मार्ग में कुल ग्यारह स्थानों पर शिवलिंग स्थापित किए, जिसमें वर्तमान वनखंडी स्थान (बनवारीपुर) के नाम से प्रसिद्ध शिवलिंग भी एक है। उक्त स्थान आज़ शिवगंज के नाम से प्रसिद्ध है तथा प्रखंड क्षेत्र के चंदौर पंचायत के अंतर्गत आता है। यूं तो यहां प्रतिदिन श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है वहीं फाल्गुन कृष्णपक्ष चतुर्दशी को महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जलाभिषेक के लिए उमड़ती है।
उक्त अवसर पर पुरे चार दिनों तक श्रद्धालुओं का जमावड़ा मेला में तब्दील हो जाती है। अर्थात उक्त अवसर पर चार दिवसीय भव्य मेला लगता है, जिसमें फर्नीचर, हार्डवेयर, श्रृंगार, खिलौना, मिठाई सहित घरेलू उपयोग की सामग्री का खूब बिक्री होता है। बच्चों के मनोरंजन हेतु आकाशी झूला, ब्रेक डांस, रेलगाड़ी आदि भी लगाये जाते रहे हैं।

दो दशक पूर्व तक इस मेला में मनसुरचक की मिट्टी की मुर्ति की दुकानें दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र हुआ करता था। यहां आने वाले श्रद्धालु मिट्टी की मुर्ति निश्चित रूप से खरीद कर घर ले जाते थे।, जिसमें राजनेता से लेकर विभिन्न देवी देवताओं, जंगली व पालतू जानवरों, विभिन्न पक्षीओं सहित अन्य आकार की मुर्तियां शामिल हैं। इसके लिए मंसूरचक के कालाकार महीनों से तैयारी करते थे। और यह मेला मनसूरचक के काला कारों के लिए जीवन का आधार हुआ करता था। इसके अलावा वसंत पंचमी व सावन में भी जलाभिषेक के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ बाबा वनखंडी स्थान में उमड़ पड़ती है। यहां खुले स्थान में प्राचीन काल के पीपल वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित है वहीं अन्य देवी देवताओं की प्रतिमा मंदिर में विराजमान हैं। यहां लगभग दर्जन भर से ज्यादा देवी देवता स्थापित हैं।
बनखंडी स्थान भगवानपुर प्रखंड मुख्यालय से पांच किलोमीटर पश्चिम, बछवाड़ा व मनसूरचक से लगभग दस किलोमीटर पूरब व तेघड़ा से छः किलोमीटर उत्तर दिशा में अवस्थित है तथा चारों ओर से आने जाने की सुविधा उपलब्ध है। बनखंडी बाबा की महिमा अपरम्पार है। बेगूसराय, समस्तीपुर जिला सहित आसपास के अन्य जिलों के श्रद्धालुओं का यहां आना जाना सालों भर जारी रहता है।
यहां जलाभिषेक,ब्रह्मण भोजन,मुंडन, विवाह आदि के लिए श्रद्धालु आते रहते हैं। लेकिन यहां न तो स्थानीय और न ही प्रशासनिक स्तर पर श्रद्धालुओं की सुविधा की कोई व्यवस्था रहती है। मेला की तैयारी आरंभ हो चुका है। दुकानें सजने लगी है।
