गौरव कुमार AV भारत न्युज संवाददाता बखरी/बेगूसराय
महर्षि मेंही आश्रम मक्खाचक बखरी द्वारा आयोजित दो दिवसीय विराट ज्ञान यज्ञ एवं सत्संग कार्यक्रम के दूसरे दिन शुक्रवार को श्रद्धालु भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। इस अवसर पर संतमत के पूज्य संत स्वामी व्यासानंद महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि मानव जीवन परमात्मा की प्राप्ति का एक दुर्लभ अवसर है, जिसे व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।
महाराज जी ने कहा कि संसार के भोग-विलास और क्षणिक सुखों में मनुष्य इतना उलझ जाता है कि अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूल जाता है। संतों ने बार-बार समझाया है कि मनुष्य का सच्चा कल्याण तभी संभव है जब वह अपने भीतर की यात्रा प्रारम्भ करे और नाम-सुमिरन, ध्यान तथा भजन के मार्ग को अपनाए।

उन्होंने कहा कि संतों की वाणी मनुष्य को बाहरी आडंबरों से हटाकर भीतर की साधना की ओर ले जाती है। जब मनुष्य अपने मन को इन्द्रियों के विषयों से हटाकर अंतर में लगाता है, तब धीरे-धीरे मन शांत होने लगता है और उसी शांति में परमात्मा की अनुभूति का द्वार खुलता है। संतमत का मार्ग सरल, सहज और अनुभव का मार्ग है।
स्वामी व्यासानंद महाराज ने आगे कहा कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए गुरु की शरण अत्यंत आवश्यक है। सच्चे गुरु ही साधक को सही दिशा देते हैं और भीतर की साधना का रहस्य समझाते हैं। गुरु की कृपा, सत्संग की प्रेरणा और नियमित साधना—ये तीनों मिलकर साधक के जीवन को बदल देते हैं। श्रद्धा, धैर्य और निरंतर अभ्यास के साथ साधना करने वाला व्यक्ति निश्चित ही आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है।
महाराज जी ने सत्संग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सत्संग एक ऐसा पवित्र वातावरण है जहाँ मनुष्य को सत्य की प्रेरणा मिलती है। इससे विवेक जाग्रत होता है, मन में भक्ति उत्पन्न होती है और जीवन में सदाचार आता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से संतों की वाणी को अपने जीवन में उतारने का आग्रह किया।
प्रेम, दया और अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा अपने आशीर्वचन में उन्होंने कहा कि मनुष्य को प्रेम, दया, सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलना चाहिए। परिवार और समाज में सद्भाव बनाए रखते हुए प्रतिदिन कुछ समय ईश्वर के स्मरण और ध्यान के लिए निकालना चाहिए। सच्चे मन से साधना करने वाले साधक को अंततः भीतर प्रकाश और अनहद नाद का अनुभव होता है, जिसमें जीवन की सच्ची शांति और आनंद निहित है।कार्यक्रम के दौरान पूरा नगर भक्तिमय माहौल में डूबा रहा।
लगभग 50 हजार श्रद्धालुओं ने दिन-रात चल रहे महाभंडारे का प्रसाद ग्रहण किया। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए केशरवानी वैश्य सभा द्वारा पेयजल की विशेष व्यवस्था की गई थी।पूरे सत्संग पंडाल में संतमत से संबंधित कई स्टॉल लगाए गए थे, जो श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बने रहे। इस दौरान सत्संगियों द्वारा स्तुति-आरती भी प्रस्तुत की गई। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों के लोग पूरी मुस्तैदी के साथ व्यवस्था में जुटे रहे।
