लेखक: चिंतक विजय भारती, पत्रकार, बेगूसराय
मित्रों,
आज गुरु पूर्णिमा है, इसलिए सबसे पहले गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं। गुरु का अर्थ है – जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए। वह सेतु जो हमें अज्ञान से ज्ञान, अधर्म से धर्म और मोह से मुक्ति तक पहुंचाए।
आज का अंधकार क्या है?
आज जीवन में अंधकार का अर्थ केवल रात का अंधेरा नहीं है। यह वह अंधकार है जहाँ –
- नास्तिकता बढ़ गई है।
- शिष्टाचार, संस्कार व मर्यादा का घोर अभाव है।
- बड़ों, माता-पिता का सम्मान कम हो गया है।
- आचरणहीनता सामान्य हो गई है।
- मां, बहन, बेटी के प्रति मर्यादा क्षीण हुई है, लज्जा का लोप हुआ है। शर्म अब बीते दिनों का शब्द हो गई है।
- रिश्तेदारों के प्रति कर्तव्यबोध समाप्त हो रहा है।
शास्त्रों की भाषा में यही अज्ञानता है। और जो इस अज्ञानता को दूर कर, मोक्ष का मार्ग दिखाए, वही सच्चा गुरु है।
गुरु कौन?
जो हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और अहंकार – इन 6 विकारों से मुक्त करे, वही गुरु है। लेकिन संत कहते हैं, अब सृष्टि के अंत का समय निकट है। इसलिए सच्चे गुरु भी दुर्लभ हो गए हैं। अंधकार से प्रकाश की ओर जाने वाले मार्ग मानो बंद होते जा रहे हैं।
समय का चक्र
विद्वानों का मत है कि सृष्टि का एक चक्र 5000 वर्ष का होता है – सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग। प्रत्येक युग लगभग 1250 वर्ष का।
सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग अब बीत चुके हैं। आज संगम युग चल रहा है।
मानव सृष्टि की घड़ी में 11 बजकर 59 मिनट 59 सेकंड हो चुके हैं। अब 12 बजने वाले हैं। यानी “चला-चली” की बेला आ गई है। चारों ओर चीख-पुकार, क्रोध, वासना, लोभ और अहंकार का साम्राज्य है। धर्म के नाम पर ढोंग, पाखंड और दिखावा रह गया है। मर्यादा लुप्त है।
कील से चिपक जाओ तो साबुत बच जाओगे
संतों ने कहा है – “धरती-आसमान रूपी चक्की में काल मानव को पीस रहा है। इसमें कोई साबुत नहीं बचता।”
लेकिन जो चक्की कील से चिपक जाता है, वही साबुत बचता है। इस कलयुग में वही साबुत बचेगा, जो सृष्टि के मालिक, ईश्वर रूपी कील की शरण में चला जाएगा। बड़े-बड़े संत भी तब तक नहीं बचेंगे, जब तक वे वास्तविकता से दूर, आस्था का नाटक करते रहेंगे।
सतयुग यानी स्वर्णयुग आने वाला है, पर उस गाड़ी में जगह सीमित है।
जो सुखमय, आनंदमय युग में जाना चाहता है, उसे ढोंग-पाखंड छोड़कर ईश्वर से जुड़ना होगा।
आज गुरु पूर्णिमा पर बस इतनी ही प्रार्थना –
“गुरु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलें।”
धन्यवाद।
चिंतक
विजय भारती
पत्रकार, बेगूसराय


