नवीन कुमार मिश्रा AV भारत न्युज संवाददाता बेगूसराय
भारतीय संस्कृति में प्रत्येक पर्व के साथ आध्यात्मिक संदेश और जीवन दर्शन जुड़ा होता है। उन्हीं पावन पर्वों में से एक है होली, जिसे रंगों, उल्लास और भक्ति का अद्भुत संगम माना जाता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल बाहरी रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि अंतर्मन को प्रेम, करुणा और सद्भाव से रंगने का अवसर भी है।
इस वर्ष 3 मार्च को चंद्रग्रहण लगने जा रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि रंग कब खेला जाएगा? पंडित माधव पाठक के अनुसार चंद्रग्रहण लगने से नौ घंटे पूर्व सूतक काल प्रारंभ हो जाता है। सूतक काल में किसी भी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान और उत्सव मनाने से परहेज किया जाता है। इसी कारण इस वर्ष होली 4 मार्च 2026 को मनाई जाएगी।
शास्त्रसम्मत विधि के अनुसार ग्रहण समाप्त होने के बाद ही रंग खेलना उचित माना गया है। पंचांग के अनुसार इस बार होली के दिन ही चंद्रग्रहण लगेगा, जो भारत में भी दृश्यमान रहेगा। इसलिए इसका सूतक काल भी मान्य होगा। चंद्रग्रहण 3 मार्च को दोपहर 3 बजकर 20 मिनट पर प्रारंभ होगा और शाम 6 बजकर 47 मिनट पर समाप्त होगा। इस प्रकार ग्रहण की कुल अवधि 3 घंटे 27 मिनट की रहेगी।
होली का मूल संबंध भक्त प्रह्लाद और उनके पिता हिरण्यकशिपु की कथा से जुड़ा है। हिरण्यकशिपु एक असुरराज था, जिसने अहंकारवश स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया था। किंतु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। अनेक यातनाएं देने के बावजूद प्रह्लाद की भक्ति अडिग रही। अंततः हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई। किंतु दैवीय न्याय से होलिका जलकर भस्म हो गई और प्रह्लाद सुरक्षित रहे। इसी घटना की स्मृति में होलिका दहन किया जाता है।
होलिका दहन केवल लकड़ियों, गोबर के उपलों और बल्लों का दहन नहीं है, बल्कि यह अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या और पाप प्रवृत्तियों के त्याग का प्रतीक भी है। यह पर्व सामाजिक समरसता और आपसी प्रेम का संदेश देता है। इस दिन छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, जाति-पंथ के भेद मिटाकर सभी एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। रंगों के इस पर्व के साथ पकवानों और मिठाइयों की भी विशेष परंपरा है। हर घर में तरह-तरह की मिठाइयाँ और पकवान बनाए जाते हैं। नमकीन पूड़ियाँ और मालपुए इस त्योहार का स्वाद और भी बढ़ा देते हैं।
