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Home » लखनपुर में होती है मां चामुंडा की पूजा
धर्म

लखनपुर में होती है मां चामुंडा की पूजा

AV BHARAT NEWS
Last updated: September 30, 2025 6:36 pm
AV BHARAT NEWS
10 months ago
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कोरोना काल से पूर्व यहां हजारों खस्सी,भैसा, भेड़ आदि की होती थी बलि

विजय भारती ब्यूरो AV भारत न्युज बेगुसराय

भगवानपुर प्रखंड अंतर्गत बलान नदी के कछार पर अवस्थित लखनपुर में माता दुर्गा की पूजा की अलग ही परंपरा रही है। इस आस्था स्थल और मैया के दरबार के संबंध में कई किवदंती प्रचलित है। मंदिर के पूर्व प्रधान पुजारी स्वर्गीय अविनाश चक्रवर्ती उर्फ टूना चक्रवर्ती ने बहुत पहले एक मुलाकात के दौरान बताया था कि हमारे पूर्वज वर्षों पूर्व मुगल काल में पश्चिम बंगाल से यहां आए थे ,उन दिनों पश्चिम बंगाल के नदिया जिला पर जब मुगलों का आक्रमण हुआ था तब मुगलों से त्रस्त होकर वहां से कई परिवार जहां-तहां पलायन कर गये, उन्हीं लोगों में से कुछ लोग बेगूसराय के विभिन्न गांव में आकर बस गये। उन्हीं परिवारों में मनराज सिंह का परिवार भी शामिल था जो भगवानपुर प्रखंड के लखनपुर ग्राम में आकर बस गये थे। कहा जाता है कि मनराज सिंह जब नदिया जिला से भागकर यहां आये थे तो अपने साथ राजपुरोहित एवं अपनी आस्था की ईष्ट देवी माता की पिंडी भी लेकर यहां आए थे ।आज वह परिवार नहीं रहा, इन्हीं के रिश्तेदार बछवाड़ा प्रखंड निवासी महेश सिन्हा इस देवी मंदिर के मेरपति हैं। इनसे पहले कई पुश्तों से इन्हीं के पूर्वज मेरपति हुए हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार मनराज सिंह अपनी काबिलियत के बल पर न सिर्फ इलाके के तहसीलदार बन गए थे ,बल्कि लखनपुर के जमींदार भी बन गए और साथ आए राजपुरोहित के उचित सलाह पर साथ लेकर आये मां की पिंडी को सिद्धमंत्रों के जाप के साथ यहां स्थापित भी किया जो आज भी शक्ति पिंडों के रूप में विराजमान है। नित्य प्रतिदिन सुबह-शाम जहां पूजा पाठ की प्रथा निरंतर जारी है जिसके लिए सहायक पुजारी के रूप में सीताराम झा नियुक्त हैं। सीताराम झा से पूर्व इनके पिता स्वर्गीय मधुकांत झा पुजारी हुआ करते थे।यहां के सिद्ध माता की पूजा आराधना का विधि विधान भी अन्य इलाकों से कुछ अलग है। यानी बंगाल और मिथिला की तर्ज पर पारंपरिक पूजा का विधान यहां प्रचलित है। यही वजह है कि माता के आगमन और प्रस्थान दोनों बलि से ही शुरू होता है। मान्यता के मुताबिक यहां अश्वनी कृष्ण पक्ष बुद्धनवमी तिथि के दिन यहां कलश स्थापना होता है। पुजारी की मान्यता है कि इसी दिन शरदकाल को तुला राशि में देवी का आगमन होता है तथा इसी दिन भगवान श्रीराम ने लंका पर विजय हेतु देवी का आह्वान किया था। इस दिन भी बली की प्रथा चलायमान है। इसके बाद पुनः आश्विन शुक्ल पक्ष चतुर्थी को भी बलि दी जाती है। सप्तमी तिथि के तृतीय कलश की स्थापना नवपत्रिका पूजा के उपलक्ष्य में किया जाता है। सप्तमी की रात्रि में ही पूर्ण विधि-विधान के साथ देवी की आराधना- पूजा की जाती है, जिसे जगरणा भी कहते हैं। पूर्व में महाअष्टमी तिथी की रात्रि में निशापूजा कालरात्रि के बाद भेड़, खस्सी की बलि दी जाती थी। नवमी तिथि को महानवमी पूजा के बाद महिष तथा भेड़ का संकल्प किया जाता था, वहीं मध्यरात्रि के बाद मंदिर के अंदर-बाहर धो-पोंछकर पुजारी कुछ विशेष लोगों के साथ मंदिर में फुलहास का कार्यक्रम आरंभ करते थे। देवी के हाथों में पांच लाल अड़हुल की कलि देकर उपस्थित भक्तगण भजन- कीर्तन कर मां की प्रार्थना करते थे। भक्तों की आराधना-पूजा उस समय सफल मानी जाती थी, जब मां के हाथों की कली फूल बनकर अपने आप धरा पर आ गिरती थी, देवी की प्रसन्नता के प्रतीक फूल को श्रद्धालु न सिर्फ सहेज कर रखते थे, बल्कि श्रद्धा-भक्ति के साथ उसे ताविज आदि में भरकर पहनते भी थे।फुलहास के उपरांत भी बलि दी जाती थी। नवमी के दिन जहां मंदिर में प्रवेश करना मुश्किल हो जाता है, वहीं ब्राह्मण भोजन और मुंडन जैसे शुभकार्य भी संपन्न कराये जाते हैं। विजयदशमी के दिन लगभग सात-आठ साल पूर्व भैंसा की बलि का भी विधान था। बलि के बाद देवी के चरणों में पुष्पांजलि अर्पित की जाती है और फिर प्रतिमा विसर्जन कार्यक्रम के दौरान अन्नपूर्णा देवी का भोग लगाने का नियम है। शोभा यात्रा कार्यक्रम के बीच भी बलि की प्रथा है ,जिसे यात्रा बलि कहते हैं, लेकिन वर्तमान में खस्सी, भेंड़, भैंसा की बलि नहीं दी जाती है, उसके जगह शिशकोहरा की बलि दी जाती है। भैंसा और भेंड़ की बलि लगभग एक दशक पूर्व से बंद है वहीं छांगर बलि अर्थात खस्सी की बलि कोरोना काल से ही बंद कर दिया गया है।ऐसे आस्था स्थल को प्रशासनिक स्तर पर न सिर्फ विकसित करने की जरूरत है, बल्कि इसे धरोहर के रूप में संवारने की आवश्यकता है। किंतु प्रशासनिक उदासीनता के चलते इस ऐतिहासिक महत्व के आस्था-स्थल का स्वरूप निखर कर सामने नहीं आ सका है। इस दिशा में साधन सुविधा के लिए क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि की भूमिका भी निराशाजनक ही रही है।

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