विजय भारती ब्यूरो AV भारत न्यूज
पुत्रवती महिलाएं अपने पुत्र की दीर्घायु , पुत्र की रक्षा तथा सुख समृद्धि की कामना से रविवार को जीमूतवाहन व्रत रखेंगी। उक्त व्रत पुत्रवती महिलाओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसके संबंध में दो कथाएं प्रचलित है। पहली कथा के अनुसार जीमूतवाहन ने गरुड़ के पंजे में फंसे एक वृद्धा के पुत्र को बचाने के लिए स्वयं अपने स्थान पर लाल कपड़े में लपेटकर गरुड़ के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। गरुड़ ने जीमुतवाहन की इस बहादुरी तथा दयालुता से प्रभावित होकर जीमुतवाहन को जीवन दान दिया तथा नागो का भक्षण का वरदान त्याग दिया। इसलिए पुत्रवती महिलाएं इस दिन जीमुतवाहन की पुजा करती है तथा अपने पुत्र की रक्षा की कामना करती है।दूसरी कथा के अनुसार महाभारत युद्ध के समापन

के उपरांत अश्वत्थामा अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भस्थ शिशु पर ब्रह्मास्त्र चला दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पुण्य बल के प्रताप से उस गर्भस्थ शिशु को बचा लिया। गर्भस्थ शिशु की मौत फिर उसके गर्भ में ही जीवित होने के कारण जीवित्पुत्रिका कहा गया। अर्थात उसी दिन से पुत्रवती मताये अपने पुत्र की रक्षा व दीर्घायु तथा सुख समृद्धि की कामना से जितिया व्रत रखती है।मताये आश्विन कृष्ण पक्ष सप्तमी को नहाय खाय करती है जो इस वर्ष शनिवार को है। शनिवार को रात्रि के अंतिम पहर में व्रती महिलाएं ओठगन करेगी। फिर रविवार को 24 घंटे का निर्जला उपवास में रहेगी। सोमवार को स्नान, पूजा के उपरांत पारण करेगी। अर्थात अष्टमी रविवार को व्रत तथा सोमवार नौवीं तिथि को पारण करेगी। इसे बुधनौवी भी कहा जाता है।
