नवीन कुमार मिश्रा AV भारत न्युज संवाददाता नावकोठी/बेगूसराय
नावकोठी प्रखण्ड क्षेत्र अंतर्गत एपीएस खेल मैदान व समसा दुर्गा मंदिर में चैत्र नवरात्रि के छठवें दिन मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा की गई।पंडित माधव पाठक व रतीश मिश्रा ने बताया कि यह दिन साहस,विजय और शक्ति प्राप्ति के लिए विशेष महत्व रखता है।
मां कात्यायनी की उपासना से भक्तों को धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष की प्राप्ति में सफलता मिलती है तथा सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति भी होती है।मां कात्यायनी का वर्ण सुनहरा (स्वर्णिम) है। माता की चार भुजाएं हैं और वे रत्नों से सुशोभित रहती हैं।वे शेर (सिंह) पर सवार होती हैं।उनके दाहिने ऊपरी हाथ में अभय मुद्रा है,जो भक्तों को आशीर्वाद देती है।नीचे वाला दाहिना हाथ वर मुद्रा में है।बाएं ऊपरी हाथ में चंद्रहास नामक तलवार है,जबकि नीचे वाले बाएं हाथ में कमल का फूल है।यह स्वरूप साहस,शक्ति और विजय का प्रतीक है।भक्तों ने मां कात्यायनी का मूल मंत्र: ॐ देवी कात्यायन्यै नमः का जप किया।
पौराणिक कथा के अनुसार,महर्षि कात्यायन नि:संतान थे।उन्होंने पुत्री प्राप्ति के लिए देवी भगवती की कठोर तपस्या की। देवी प्रसन्न हुईं और वर दिया कि वे महर्षि कात्यायन के घर पुत्री रूप में जन्म लेंगी।इसी बीच महिषासुर नामक असुर ने तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था।देवताओं ने ब्रह्मा,विष्णु और महेश से प्रार्थना की।तीनों देवताओं के तेज से एक दिव्य शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ।देवताओं ने उनका नाम कात्यायनी रखा,क्योंकि वे सबसे पहले महर्षि कात्यायन के घर जन्मी थीं।मां कात्यायनी ने महिषासुर का वध किया और देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई।
इसलिए उन्हें महिषासुरमर्दिनी भी कहा जाता है।मां कात्यायनी की पूजा से साहस,विजय और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।अविवाहितों को सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।विवाहितों के वैवाहिक जीवन में सुख-शांति आती है। इस दिन की पूजा से पितृ दोष,कालसर्प दोष और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। भक्तों को धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति में सहायता मिलती है।
